आग भी, अंगड़ाई भी

-Prashant Das

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आग भी, अंगड़ाई भी, पुरजोश भी, मुरझाई भी
अजीब कितनी है रही मेरी ज़ीस्त की लड़ाई भी
.
हम समंदर के किनारे सोचते ही रह गये
सैलाब और तूफ़ान आए, बह गई परछाई भी
.
चिल्मनों के पार हमनें अश्क कर डालें हैं सुर्ख़
ग़रूर उनका चढ़ चला, गहरी हुई है लड़ाई भी
.
ख़ुदा बन जाने की ख़्वाहिश उनकी जब-जब हो गई
हम तमाशा देख रोए, फिक़्र भी, रुसवाई भी
.
तारीख़ को गढ़ने की कोशिश कर रहे वो रात-दिन
हक़ीक़त की क़स्में हमने खाई भी, निभाई भी
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घर जला कर ख़ाक कर दो, रूह है महफ़ूज हरदम
फेंक कर दरिया में काग़ज, कलम और रौशनाई भी
.
आवाज़ की उन सरहदो-दीवार तक, उन मरहलों तक
ख़ामोश दिल की मौसिकी हमने सुनी और गाई भी
.
शमशीर, खंज़र सब चले, ख़ामोश हम सहते रहे
सलामती इसी में समझी, इसी में थी भलाई भी।
.

[पुरजोश = enthusiastically, ज़ीस्त: life, रुसवाई=embarrassment, तारीख= history]
Thank you Hemant Das for the valuable edits.

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