कंक्रीट के उन दरख्तों में

-Prashant Das

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[[ My poem dedicated to those homeless laborers who are walking hundreds of miles on their way “home”, tired, hungry, fatigued… with young children on their shoulders, and watching their fellowmen suffering at an unprecedented scale…]]

मज़हब नहीं, क़ुव्वत नहीं, चेहरा नहीं और घर नहीं
धड़कनें तो चल रही जीने की फुरसत गर नहीं।
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उन मकानों के झरोखों में, दीवारों में, छतों में,
दफन मेरा है पसीना, छड़ नहीं, पत्थर नहीं।
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मेरी जवानी, अश्क़, मेहनत, खोज लो उस नीँव में
मेरे बिना कंक्रीट के उन दरख्तों में जड़ नहीं।
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घर उन्हीके, दर उन्हीके, उड़ान उनकी, पर उन्हीके
हम भी सितारे देख सोते रात में कमतर नहीं।
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रोटियां सूखी सही, बासी सही, और कम सही
एक-दो मिल जाएं तो, हम मांगते अक्सर नहीं।
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शहर में रोज़ी गयी, फिर छत गई, उम्मीद भी
गाँव में ग़ुरबत सही, पर ज़िन्दगी बदतर नहीं।
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ट्रैन की उन पटरियों पर, गाँव के रस्ते जो हैं
कुचले गए मज़दूर हम साहब के बराबर नहीं।।
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Vocabulary: क़ुव्वत = dominance, झरोखा= window,
अश्क़ = tears, दरख़्त= tree, ग़ुरबत = poverty
Thank you Hemant Das, for the edits.

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