पादुका कथा

[This post is inspired by a recent thread on IIM Ahmedabad’s forum. The story was originally written and published in 2018 in my collection of short stories. ] No puns intended. Just for fun.

गिर में जंगली गधों का एक अभयारण्य है. वहाँ के सैर की एक घटना याद आ रही है: झुण्ड का एक सदस्य जो बिछड़ गया था, उसको दूर से दूसरे साथी दीख गए थे. अपूर्व वेग से वह भागा था झुण्ड की ओर. कितना प्रेम, कितनी आत्मीयता थी उसकी छलांग में. उस दृश्य पर हम सब भावविह्वल हो उठे थे. सालों बाद आज बिलकुल उसी बिछड़े सदस्य की तरह महसूस कर रहा था मैं. आखिरकार अपनी संस्कृति के लोगों की पार्टी में पहली बार जाना होगा!

सारे परिवार को पूना में छोड़कर शिकागो आया था. अपनी कंपनी से अकेला इंसान भेजा गया था. तीन महीने बीत गए, तीन और बिताने हैं. अब तक ढंग से शि-काव-गोव् भी उच्चरित नहीं कर पा रहा हूँ, लेकिन हर रोज़ कांफ्रेंस कॉल पर बॉस पूना से बैठा यही शिकायत लगाता है कि मैं क्लाइंट्स के साथ “इंटीग्रेट” नहीं हो पा रहा हूँ- नया प्रोजेक्ट कैसे मिलेगा उनसे? “सेक्स, मौसम और अमेरिकन फुटबॉल”, इनके बारे में चर्चा करने की हिदायत दी गयी थी. “अमेरिकन्स को अच्छी लगती है”, ऐसा बॉस ने कहा था. लेकिन मैं इन तीनो विषयों में फिसड्डी निकला. ऊपर से हर सुबह बीवी के हाथ के पराठे याद आते हैं. कल्याण भेल भण्डार का चाट याद आता है. सहकर्मियों के साथ रजनीकांत की मूवीज देखना, लंच के बाद लखन की दूकान पर मीठा पान, और शनिवार को बाइक पर बैठ कर सपरिवार लवासा तक का सफर… सब कुछ याद आ रहा है.

आज सुबह जब बॉस ने “हिन्दू संस्कृति” संस्था का पम्पलेट ईमेल किया, तो जान-में-जान आयी. आज ही तो है उनकी गणपति पूजा पार्टी. वाह! अपने जैसे लोगों से मिलूंगा, देसी खाना खाऊंगा, हिंदी में बातें होंगी… मजा आएगा.

Paduka Katha

शुक्र है, बीवी की ज़िद पर मैंने अपने साथ शेरवानी भी पैक कर ली थी – चटख लाल. रेशम की पीली ओढ़नी भी थी साथ में. पर उसके साथ पहनने के लिए ढंग का चप्पल नहीं मिला. किस्मत से जॉन फ्लोवोग की जूते की दूकान पड़ोस में ही थी. क्या रेंज था उनके पास! अब अमरीका आये हैं तो डॉलर्स में खरीदें, रुपये में नहीं. यह सोचकर अपने पसंद से एक बढ़िया जूती खरीदी. शालीन थी, शेरवानी से मैचिंग और बिलकुल वैसी जो मेरी पर्सनालिटी पर खिल जाए. बस, मन गदगद हो गया, जनाब.

“इंडियन संस्कृति पर्व” का आयोजन “हिन्दू संस्कृति केंद्र” के शिवालय में हो रहा था. काफी जनता थी. ज्यादातर मेरी तरह शेरवानी में थे. प्रांगण में पदत्राण वर्जित था. लोग अपने जूते-चप्पल सीढ़ियों पर रख कर जा रहे थे. हर कोई किसी न किसी झुण्ड का सदस्य मालूम होता था. मराठी, तेलुगु, बंगाली, तमिल, मलयाली, लोगो में मातृभाषा में बातें चल रही थी.

एक झुण्ड हिंदी बोलने वालों का भी था. मैंने सोचा उनको नमस्ते कर आऊं. लेकिन उस माहौल में महाभारत के अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह भेद रहा हूँ, ऐसा महसूस हुआ. एक साहब की छाती पर तिरंगा बैज था जिस पर “SK कपूर, VP” लिखा  था . उन्होंने वाणिज्य-मुस्कान के साथ स्वागत तो किया लेकिन उस से ज्यादा कुछ ज्यादा दिलचस्पी न दिखलाई.

इतने में आरती शुरू हो गयी. मलयाली पंडित जी संस्कृत में मंत्रोच्चारण कर रहे थे. आरती की थाली प्रांगण में घुमाई गयी. उसमे डॉलर्स के बड़े-बड़े नोट पड़े थे. सम्मान का विषय था. मैंने भी दस डॉलर का नोट दान कर दिया. पेट में चूहे कूद रहे थे और भोजन आरम्भ हो चुका था बगल के हॉल में.

“कहा से हो? हिंदी बोलते हो?”, पीछे से आवाज़ आयी. एक अधेड़ उम्र के जनाब दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे थे. मेरी तरह वह भी भीड़ में तनहा थे. “जी पूना में रहता हूँ, लेकिन हूँ कोटा, राजस्थान से, और आप?…”, मैंने कहा.  “माइसेल्फ नरेश राइ फ्रॉम कानपुर…” हमारी छिटपुट बातें होती रही, और दोनों एकलव्य को साथ मिल गया. दोनों भोजन हाल को गए. छक कर खाया: पूड़ियाँ, ढोकला, बिरयानी, गाजर का हलवा, अवोकेडो की चटनी, और न जाने क्या क्या. रिकोटा चीज़ से बना रसगुल्ला थोड़ा अजीब लग रहा था. लेकिन एक बार एंट्री फी दे दिया तो बस माल-ए-मुफत, दिल-ए-बेरहम.

आनंद आ रहा था लेकिन एकाएक मुझे याद आया कि कल सुबह क्लाइंट मीटिंग की तैयारी अधूरी रह गयी है. सो एक गुलाब जामुन मुँह में ठूंसा, नरेश बाबू को सलाम किया और बाहर की ओर निकल पड़ा..

बाहर मौसम सुहाना था और साँय-साँय हवा बह रही थी. जूते चप्पलों का अम्बार लगा था. इस अम्बार में अपनी जूतियां ढूँढना कठिन कार्य लग रहा था. मैंने याद करने कि कोशिश की- हाँ, कचरे के डब्बे के पीछे छुपा कर रखी थी मैंने अपनी जूतियां. केले के पत्तों के नीचे ढँक कर. कचरे का डब्बा मिल गया. केले के पत्ते भी दिख गए. लेकिन उनके नीचे जूतियां नहीं मिलीं. खूब ढूंढा: नल के नीचे, कुंड के पास… सारा परिसर छान मार डाला. नहीं मिली. हे भगवान्. कोई मेरी नयी-नवेली जूतियां लेकर चम्पत हो गया! हाय मेरी डेढ़ सौ डॉलर की जूतियां. हाय रे शिकागो. कैसी सभ्यता! कैसे कुलीन दिखने वाली जनता! धिक्कार है!

मैं क्या करूँ? ख़ाली पैर तो वापस जा नहीं सकते. कितनी ठण्ड है शिकागो में. कुछ तो पहनना ही पड़ेगा. ज्यादा लोग तो थे नहीं बाहर. और किसी को मेरे से क्या लेना देना? इतनी जूतियां पड़ी हैं और…. पसंद कर लूँ अपने लिए कोई. मिलते-जुलते दाम वाली मिल जाएं तो दुःख कम होगा.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s