-Prashant Das ‘साहिल’
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रह जाए ग़र तो इश्क है, खो जाए ग़र तो मर्ज़ है
ये दर्द-ए-दिल की है सदा, तू गुनगुना क्या हर्ज़ है।
दिल रात भर जलता रहा, हम रात भर लिखते रहे
इन ग़ज़लों में अब है ही क्या, न साज़ है न तर्ज़ है।
हमदर्द जानें हैं कहां, कोई चारागर मिलता नहीं
अब पारा-पारा दिल हुआ, इलाज की किसको ग़र्ज़ है।
हम दौलतों के ख़्वाब में, उस दर गए इस दर गए
जेबों में भर के आए हैं, कुछ अश्क है कुछ क़र्ज़ है।
दिल काग़ज़ का है किला, इन चिंगारियों के वक्त में
उठ रहे शोलों को बुझा, ये ही मुनासिब फ़र्ज़ है।
वो पंचनामा कर गए, मेरा नाम जिसमें दर्ज़ है
उन शरीफ़ों को दुआ है ‘साहिल’ आदाब अर्ज़ है।
दिल अज़ीज़ उम्दा ग़ज़ल मान्यवर 🇮🇳🇮🇳🙏🙏