फिर धुंध उठी

My latest attempt at Hindi /Urdu poetry

फिर धुंध उठी, मौसम-ए-बहार आया
क्या हुआ, अब कौन सा बुख़ारआया।

दवा   तक   देते   नही  अब  चारागर
मर्ज़ आया नहीं, दर्द ज़ार-ज़ार आया।

पिछली बार मैख़ाने गए कब याद नही
बिन पिये कौन सा ख़ुमार आया।

दफ़्तर पड़ी उस मेज़ पर  लेटा अक्सर
और  याद  मेरे गांव का  हिसार आया।

मालूम था है वस्ल उनका नामुमकिन
अक्सर गया, करके इंतज़ार आया।

दश्त  के  फूलों से हमको  क्या लेना
तपती हुई  धूलों का कर ग़ुबार आया।

कर गुहार आया, ज़ीस्त दे उधार आया
तर्क-ए-आरज़ू  का पल बेशुमार आया।


पादुका कथा

[This post is inspired by a recent thread on IIM Ahmedabad’s forum. The story was originally written and published in 2018 in my collection of short stories. ] No puns intended. Just for fun.

गिर में जंगली गधों का एक अभयारण्य है. वहाँ के सैर की एक घटना याद आ रही है: झुण्ड का एक सदस्य जो बिछड़ गया था, उसको दूर से दूसरे साथी दीख गए थे. अपूर्व वेग से वह भागा था झुण्ड की ओर. कितना प्रेम, कितनी आत्मीयता थी उसकी छलांग में. उस दृश्य पर हम सब भावविह्वल हो उठे थे. सालों बाद आज बिलकुल उसी बिछड़े सदस्य की तरह महसूस कर रहा था मैं. आखिरकार अपनी संस्कृति के लोगों की पार्टी में पहली बार जाना होगा!

सारे परिवार को पूना में छोड़कर शिकागो आया था. अपनी कंपनी से अकेला इंसान भेजा गया था. तीन महीने बीत गए, तीन और बिताने हैं. अब तक ढंग से शि-काव-गोव् भी उच्चरित नहीं कर पा रहा हूँ, लेकिन हर रोज़ कांफ्रेंस कॉल पर बॉस पूना से बैठा यही शिकायत लगाता है कि मैं क्लाइंट्स के साथ “इंटीग्रेट” नहीं हो पा रहा हूँ- नया प्रोजेक्ट कैसे मिलेगा उनसे? “सेक्स, मौसम और अमेरिकन फुटबॉल”, इनके बारे में चर्चा करने की हिदायत दी गयी थी. “अमेरिकन्स को अच्छी लगती है”, ऐसा बॉस ने कहा था. लेकिन मैं इन तीनो विषयों में फिसड्डी निकला. ऊपर से हर सुबह बीवी के हाथ के पराठे याद आते हैं. कल्याण भेल भण्डार का चाट याद आता है. सहकर्मियों के साथ रजनीकांत की मूवीज देखना, लंच के बाद लखन की दूकान पर मीठा पान, और शनिवार को बाइक पर बैठ कर सपरिवार लवासा तक का सफर… सब कुछ याद आ रहा है.

आज सुबह जब बॉस ने “हिन्दू संस्कृति” संस्था का पम्पलेट ईमेल किया, तो जान-में-जान आयी. आज ही तो है उनकी गणपति पूजा पार्टी. वाह! अपने जैसे लोगों से मिलूंगा, देसी खाना खाऊंगा, हिंदी में बातें होंगी… मजा आएगा.

Paduka Katha

शुक्र है, बीवी की ज़िद पर मैंने अपने साथ शेरवानी भी पैक कर ली थी – चटख लाल. रेशम की पीली ओढ़नी भी थी साथ में. पर उसके साथ पहनने के लिए ढंग का चप्पल नहीं मिला. किस्मत से जॉन फ्लोवोग की जूते की दूकान पड़ोस में ही थी. क्या रेंज था उनके पास! अब अमरीका आये हैं तो डॉलर्स में खरीदें, रुपये में नहीं. यह सोचकर अपने पसंद से एक बढ़िया जूती खरीदी. शालीन थी, शेरवानी से मैचिंग और बिलकुल वैसी जो मेरी पर्सनालिटी पर खिल जाए. बस, मन गदगद हो गया, जनाब.

“इंडियन संस्कृति पर्व” का आयोजन “हिन्दू संस्कृति केंद्र” के शिवालय में हो रहा था. काफी जनता थी. ज्यादातर मेरी तरह शेरवानी में थे. प्रांगण में पदत्राण वर्जित था. लोग अपने जूते-चप्पल सीढ़ियों पर रख कर जा रहे थे. हर कोई किसी न किसी झुण्ड का सदस्य मालूम होता था. मराठी, तेलुगु, बंगाली, तमिल, मलयाली, लोगो में मातृभाषा में बातें चल रही थी.

एक झुण्ड हिंदी बोलने वालों का भी था. मैंने सोचा उनको नमस्ते कर आऊं. लेकिन उस माहौल में महाभारत के अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह भेद रहा हूँ, ऐसा महसूस हुआ. एक साहब की छाती पर तिरंगा बैज था जिस पर “SK कपूर, VP” लिखा  था . उन्होंने वाणिज्य-मुस्कान के साथ स्वागत तो किया लेकिन उस से ज्यादा कुछ ज्यादा दिलचस्पी न दिखलाई.

इतने में आरती शुरू हो गयी. मलयाली पंडित जी संस्कृत में मंत्रोच्चारण कर रहे थे. आरती की थाली प्रांगण में घुमाई गयी. उसमे डॉलर्स के बड़े-बड़े नोट पड़े थे. सम्मान का विषय था. मैंने भी दस डॉलर का नोट दान कर दिया. पेट में चूहे कूद रहे थे और भोजन आरम्भ हो चुका था बगल के हॉल में.

“कहा से हो? हिंदी बोलते हो?”, पीछे से आवाज़ आयी. एक अधेड़ उम्र के जनाब दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे थे. मेरी तरह वह भी भीड़ में तनहा थे. “जी पूना में रहता हूँ, लेकिन हूँ कोटा, राजस्थान से, और आप?…”, मैंने कहा.  “माइसेल्फ नरेश राइ फ्रॉम कानपुर…” हमारी छिटपुट बातें होती रही, और दोनों एकलव्य को साथ मिल गया. दोनों भोजन हाल को गए. छक कर खाया: पूड़ियाँ, ढोकला, बिरयानी, गाजर का हलवा, अवोकेडो की चटनी, और न जाने क्या क्या. रिकोटा चीज़ से बना रसगुल्ला थोड़ा अजीब लग रहा था. लेकिन एक बार एंट्री फी दे दिया तो बस माल-ए-मुफत, दिल-ए-बेरहम.

आनंद आ रहा था लेकिन एकाएक मुझे याद आया कि कल सुबह क्लाइंट मीटिंग की तैयारी अधूरी रह गयी है. सो एक गुलाब जामुन मुँह में ठूंसा, नरेश बाबू को सलाम किया और बाहर की ओर निकल पड़ा..

बाहर मौसम सुहाना था और साँय-साँय हवा बह रही थी. जूते चप्पलों का अम्बार लगा था. इस अम्बार में अपनी जूतियां ढूँढना कठिन कार्य लग रहा था. मैंने याद करने कि कोशिश की- हाँ, कचरे के डब्बे के पीछे छुपा कर रखी थी मैंने अपनी जूतियां. केले के पत्तों के नीचे ढँक कर. कचरे का डब्बा मिल गया. केले के पत्ते भी दिख गए. लेकिन उनके नीचे जूतियां नहीं मिलीं. खूब ढूंढा: नल के नीचे, कुंड के पास… सारा परिसर छान मार डाला. नहीं मिली. हे भगवान्. कोई मेरी नयी-नवेली जूतियां लेकर चम्पत हो गया! हाय मेरी डेढ़ सौ डॉलर की जूतियां. हाय रे शिकागो. कैसी सभ्यता! कैसे कुलीन दिखने वाली जनता! धिक्कार है!

मैं क्या करूँ? ख़ाली पैर तो वापस जा नहीं सकते. कितनी ठण्ड है शिकागो में. कुछ तो पहनना ही पड़ेगा. ज्यादा लोग तो थे नहीं बाहर. और किसी को मेरे से क्या लेना देना? इतनी जूतियां पड़ी हैं और…. पसंद कर लूँ अपने लिए कोई. मिलते-जुलते दाम वाली मिल जाएं तो दुःख कम होगा.

Beauty, Poetry, and Music

Much has been philosophized about beauty since the start of times. Socrates and -before him- Pythagoras related beauty to ethics. If something is morally good, then it is beautiful.

I particularly like the later description by Kant. He divides beauty in two type: Free and dependent. If something “beautiful” refers to deriving some other (dependent) pleasure from it (eg a building, a bottle of wine, cheesecake…), its beauty is “dependent.” But if you find something beautiful simply for what it is, promising no further pleasure than experiencing it at the moment; then it has “free” beauty. Perhaps, seeking the free beauty is a surer route to sustained happiness.

“Poppies” by Monet | Image scraped from https://wallpaperaccess.com/monet-poppies

Compare a Monet (that you can never afford to buy) and a social-media video showing an act of human kindness (that you got nothing to do with). We enjoy both nevertheless. “Beautiful,” we say in either case. This is free beauty. (There is ample scientific evidence to prove that kindness and happiness are strongly correlated.) We often agonize as a struggle with our inner-selves simply because we were unkind to others.

So, Kant and Socrates did not contradict each other.

We also derive free beauty from poetry and music. Some people in this area are beautiful. Some are awe-inspiring. If you were awestruck by something and it made you happy, that thing is beautiful. Just take Kant for his words!

I find some poets, musicians, and singers to be awe-inspiring and, hence, beautiful. Elvis Presley singing “In the ghetto”, Suresh Wadkar singing “Sanjh dhale”, Khayyam composing “Ae did e nadaan,” or Anand Bakshi writing “lambi judayee”: All are beautiful humans. The old Baba Nagarjun with his unkempt beard is just as beautiful when he writes “badal ko ghirte dekha hai. “

Time moves on. And as Heraclitus once rightly said: nothing stays the same: Time passes and with that the context changes. So, we cannot see something beautiful the same way as we did in the past. Yet, we can salvage some of our past reactions to something beautiful.

Listening to some melodious numbers is one such trick that makes us happy. And what makes us happy is beautiful.

Call me outdated, but I spent this evening listening to Khayyam Sahab’s songs (yet again). His beauty has no match. His deep musical compositions are a portal to free beauty. You pine, you extract joy, feel good about what you got and just make your peace with what you could never achieve. It’s all beautiful.

लौटकर मैं इस शहर आया

-Prashant Das

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ग़ज़ब हुआ जो लौटकर मैं इस शहर आया
मेरा माज़ी मेरी ओर, किस कदर आया ।

जहाँ ख़्वाब थे, रूमानियत की आहें थीं
आज यूँ मेरे अश्क़ों का क्यूँ बहर आया?

वो साल और थे, दरिया भी कोई और-सा था
सहरा- से इन कूंचों में, बेख़बर आया!

गली की रोशनी में सुब्ह थी औ’ शाम अलग़
शाहराह जो आया तो हर पहर आया ।

कहाँ हैं मेरे हमनवाँ, कहाँ वो माशूक़ा?
ये वो शहर तो नहीं, जाने मैं किधर आया!

अजनबी दिखती पुरानी गलियों में
पुराना आशना दिखा, लिये मेहर आया ।

सेमल का वो दरख़्त, नाव काग़ज़ की,
बच्चा दिखा जिसमें मैं ख़ुद नज़र आया ।

Sri Krishna Mandir, Imadpatti, Bihar

Our grandfather “KarnShree” Khadga Ballabh Das ‘Swajan’ (KB Das hereafter) (1912-1999) is known for authoring his Maithil epic Seeta Sheel. His emotional attachment to our ancestral village Imadpatti was strong, and a temple he built is worth mentioning. Imadpatti lies in the Jhanjharpur division of Madhubani district in Bihar. https://goo.gl/maps/Rvdt1B1kMZ1FZe8AA

As was, perhaps, the “cool” thing to do in those days, my grandfather took early retirement from his government job in 1970’s after his eldest son (our father Sri Lakshman Das: 1932-1993) took over the family responsibilities as a government officer. That did not particularly help with the financial situation of the family and my father struggled for decades to make the ends meet in his family (that included his two siblings, parents, occasional cousins who lived with him, and his own kids). In the meanwhile, KB Das’s second son (our uncle) Sri Ramakant Das joined the Bihar Police force. Sri KB Das counted on his sons’ (and his son-in-law’s, in later years) support to fulfill his selfless desires for community service. Despite the challenges, his family always supported his missions.

Sri Khadga Ballabh Das in Doranda, Ranchi (1988: visiting his eldest son Sri Laskhman Das)

While his Maithili epic Seeta Sheel was being written, KB Das concurrently launched another ambitious project i.e. to build a temple in our ancestral village. His second son Sri Ramakant Das remembers: “Babuji realized that beyond the symbolic Brahmsthan, our village did not have a temple at the entrance. People did not have a place of worship when entering or exiting the village, as is customary. So, he reached out to us with the idea of building a temple. His book project already needed some budget. Moreover, fundraising from the village was not immensely successful. Yet, we brothers happily agreed to fund the temple construction wholeheartedly, although over several years

Seeta Sheel
https://www.amazon.com/Seeta-Sheel-Goddess-Maithili-Language/dp/1530095794

[Clockwise: KB Das and wife Smt. Indramaya Devi | Eldest son Sri Lakshman Das (1932-1993) | Daughet Smt. Vidya and son-in-law Sri Arjun Narayan Chaudhary | Second son Sri Ramakant Das and daughetin-law Smt. Sheela | Eldest daughet-in-law Smt. Ashal Lata]

Here are some glimpses of the temple:

The temple has three deities: (1) Sri Radha Krishna (2) Sri Mahadev, and (3) Sri Chitragupta. For the first several years, Sri KB Das continued to send some “stipend” for the priest. His nephews in the village (Sri Vijaykant Das, in particular) was helpful in administering the construction. The Mukhiya ji of the village was also supportive in building the temple. In recent years, the temple has evolved as one of the destinations in the humble village and supports some small shops.

Prashant Das (Gram- Imadpatti) | Lausanne, Switzerland | 21 Aug 2020

आग भी, अंगड़ाई भी

-Prashant Das

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आग भी, अंगड़ाई भी, पुरजोश भी, मुरझाई भी
अजीब कितनी है रही मेरी ज़ीस्त की लड़ाई भी
.
हम समंदर के किनारे सोचते ही रह गये
सैलाब और तूफ़ान आए, बह गई परछाई भी
.
चिल्मनों के पार हमनें अश्क कर डालें हैं सुर्ख़
ग़रूर उनका चढ़ चला, गहरी हुई है लड़ाई भी
.
ख़ुदा बन जाने की ख़्वाहिश उनकी जब-जब हो गई
हम तमाशा देख रोए, फिक़्र भी, रुसवाई भी
.
तारीख़ को गढ़ने की कोशिश कर रहे वो रात-दिन
हक़ीक़त की क़स्में हमने खाई भी, निभाई भी
.
घर जला कर ख़ाक कर दो, रूह है महफ़ूज हरदम
फेंक कर दरिया में काग़ज, कलम और रौशनाई भी
.
आवाज़ की उन सरहदो-दीवार तक, उन मरहलों तक
ख़ामोश दिल की मौसिकी हमने सुनी और गाई भी
.
शमशीर, खंज़र सब चले, ख़ामोश हम सहते रहे
सलामती इसी में समझी, इसी में थी भलाई भी।
.

[पुरजोश = enthusiastically, ज़ीस्त: life, रुसवाई=embarrassment, तारीख= history]
Thank you Hemant Das for the valuable edits.

कंक्रीट के उन दरख्तों में

-Prashant Das

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[[ My poem dedicated to those homeless laborers who are walking hundreds of miles on their way “home”, tired, hungry, fatigued… with young children on their shoulders, and watching their fellowmen suffering at an unprecedented scale…]]

मज़हब नहीं, क़ुव्वत नहीं, चेहरा नहीं और घर नहीं
धड़कनें तो चल रही जीने की फुरसत गर नहीं।
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उन मकानों के झरोखों में, दीवारों में, छतों में,
दफन मेरा है पसीना, छड़ नहीं, पत्थर नहीं।
.

मेरी जवानी, अश्क़, मेहनत, खोज लो उस नीँव में
मेरे बिना कंक्रीट के उन दरख्तों में जड़ नहीं।
.

घर उन्हीके, दर भी, उड़ान उनकी, पर भी
हम भी सितारे देख सोते रात में कमतर नहीं।
.

रोटियां सूखी सही, बासी सही, और कम सही
एक-दो मिल जाएं तो, हम मांगते अक्सर नहीं।
.

शहर में रोज़ी गयी, फिर छत गई, उम्मीद भी
गाँव में ग़ुरबत सही, पर ज़िन्दगी बदतर नहीं।
.

ट्रैन की उन पटरियों पर, गाँव के रस्ते जो हैं
कुचले गए मज़दूर हम साहब से तो ऊपर नहीं।।
.

Vocabulary: क़ुव्वत = dominance, झरोखा= window,
अश्क़ = tears, दरख़्त= tree, ग़ुरबत = poverty
Thank you Hemant Das, for the edits.

दुःस्वप्न

-Prashant Das

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#Corona

बिन बेचैनी चैन क्या; दुःस्वप्न बिना ये नैन क्या
भूखे हैं, वो फिर भी चुप; बंदूकें क्या, तेरे केन क्या
दिल के टुकड़े दूर फँसे; कारें क्या, अब ट्रेन क्या 
इंसानों से प्रेम न हो तो; क्या हिंदू और जैन क्या
सबको मारा बारी-बारी; दास, स्मिथ, हुसैन क्या 
गहरी जेबें, पर दिल छोटे; लेन क्या, तब देन क्या
इंतज़ार में बीत रहे हैं; क्या दुपहर, और रैन क्या।

थोड़ी भक्ति , थोड़ा ज्ञान

-Prashant Das

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#covid19

विस्मित , चिंतित , आतंकित
हमारे अंतरतम का गान ।

एकाकी गालियां और जनपथ
अंदर से ताले लगे मकान।

हुआ क्या ऐसा इस धरती पर
बिन अनुमान , बिन संज्ञान ?

सामाजिकता कंप्यूटर तक
व्हाट्स-ऐप्प तक अनुसंधान ।

राजनीति की ज्वाला भड़की
जलता घर पर है इंसान ।

धर्म – पंथ के ईंधन पर
नफरत के नहीं पके पकवान ।

उन बेघर मजदूरों को भी
आत्मीयता मिले समान ।

भारतीयता रहे ये अस्मित
बनें रहे हम सब इंसान ।

प्रलय का अंत हमारे हाथों
होगा जल्द , निश्चित श्रीमान ।

एकमात्र संकल्प है साधन
थोड़ी भक्ति , थोड़ा ज्ञान ।

अठबज्जर करौना

-Prashant Das

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Maithili poem

Part-I: Humor

अठबज्जर मचैलक कतेक मुहजरौना
माइर बारैन्ह भगेबौ, रे तोरा करौना

बासन मंजै छी, अंगा फिचय छी
कहिया धरि बनल रहब मुहफुलौना

कतेक रामायण, कतेक महाभारत
मोबाईल बनल अछि अपन खिलौना

हजमा कतय गेल, बिला गेल चेला
मालिश वला तेल आनय, रौ जो ना

न कोई निमंत्रण न कोई हकार
बियाह, न मुंडन, आ नय कोनो गौना

सभटा ऊ फिटफाट, आर ओतेक जिट्ट
करौनाक आगू भएल फुरफुरौना

अठबज्जर मचैलक कतेक मुहजरौना
माइर बारैन्ह भगेबौ, रे तोरा करौना

Part-II: Empathy

बिला गेल विज्ञान, हैराएल ऊ संधान
विषाणु क आगू सभ, कत छोट बौना

कानय रहै माय छोटका बौवा के जे
दिल्ली स पैरे घर चलल रहौ ना

भरि पांज बचिया के धरि क कहय छल
गे , परसू बला मडुवा पेटे में छौ ना?