“Seeta Sheel”, a book by our grand father

Cover page of "Seeta Sheel"

“Seeta Sheel” is a maithili epic authored by (Late) Sh. Khadga Ballabh Das (Gram-Imadpatti, Madhubani Distt.). The 244 page hardcover edition was first published by Vidyarjun Publications in 1986. In 2013,  with permission from Sh. Ramakant Das (Patna), Smt. Binita Mallik (Mithilangan, New Delhi) took the initiative of digitizing the book.

In October 2019, Sh. Das was conferred “KarnShri” recognition for Seeta Sheel by Karn Kayasth Mahasabha.

The book depicts the life, struggles and ideals of goddess Sita who is revered for her devotion in the Hindu mythology. The complete life story is presented in two-liner verses by Shri Das. Seeta, the legendary wife of Lord Sriram was born in ancient Mithila and spoke Maithili.

How to Access / Buy the Book

About the Author

Shri Khadga Ballabh Das, a devout Hindu, completed authoring the poetic “Seeta Sheel” over several months following his voluntary retirement from the Government Press in Gulzarbagh Patna. He was known for his impeccable verse-authoring skills. The rhythm, word-choice and vocabulary he adopts in the book makes it a smooth, interesting read. The life-sketch of Seeta is based on TulsiDas’ Ram Charit Manas.

Shree Das was a mathematician, a poet and a war veteran. During the second World War he served in the British Army as an automobile technician; but developed a deep appreciation for the Indian freedom movement soon after. An excellent story teller, Shri Das was known for his dynamic cultural skills (such as conducting mathematics shows), social work, scientific experiments and, of course, literary works. Some of this dynamism is also reflected in the supplements to “Seeta Sheel” as book appendices. He devotes a page on depicting the god names in terms of numbers; and another on showcasing how a full poem could be written without using any “matras” (vowels) in Devanagri script.

During latter years of his life, Shri Das built a Shri Krishna temple in Imadpatti (Madhubani), his ancestral village. He enjoyed full support for his dynamic endeavors from his sons, Shri Lakshman Das and Shri Ramakant Das and daughter Smt. Vidya Devi and their spouses and families.

Shri Khadga Ballabh Das (1909- 1999) with wife Smt. Indramaya Devi (1912-1992) [Date unknown]

 


Some anecdotes About Shri Khadg Ballabh Das

“An Honest Man with Mistaken Identity”

Once Baba [“Grandfather”: Sri Das] was arrested on a mistaken identity by a policeman. He put handcuff on Baba’s hands to ensure that he doesn’t escape. What happened next was stunning. Once the policeman, who was taken by Baba to court, was in deep slumber and Baba had to go for a while for loo. Then Baba made it he handcuff open by his own and went out and came back and wore the handcuff as though nothing had happened. When the policeman awoke, then Baba gave him a demo showing how did he open the handcuff and went out for an urgent purpose. The policeman was so much surprised on this act of Baba that he did never put handcuffs over Baba’s hand since then.

Kumud Das [Grand son], Senior Business Journalist

 

“दृढ़निश्चयी, और अक्खड़”

  • “सीता-शील” के रचयिता हमारे बाबा (दादाजी) स्व. खड्गबल्लभ दास सचमुच आम आदमी से काफी ऊपर के व्यक्तित्व थे। यह मैं इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि वो मरे दादाजी थे वल्कि वस्तुनिष्ठ चिंतन के बाद कह रहा हूँ। एक शख्स जिसके पास मिडिल की भी डिग्री न हो और जो पूरे यौवन में जहां तहां मामूली नौकरी के लिए भटकता रहा वह भाषा पर सिर्फ अपनी मेहनत और अध्यवसाय से इतनी मजबूत पकड़ कैसे बना पाया? एकांत में रहकर निर्मल भाव से भजन कीर्तन और जाप में घंटों लगे रहते थे नैसर्गिक आनंद लेते हुए। खुद अभाव में रहते हुए भी दान देते रहते थे। धन संग्रह की प्रवृति उनमें कभी नहीं रही। न कभी झूठा नाम कमाने में रहे। सच्चे हृदय वाले भक्त थे जो बिरले ही होते हैं। जो आदमी इतना उदात्त हो जाता है वह परिवार के प्रति थोड़ा ग़ैरजिम्मेवार हो होगा ही। लेकिन परिवार को न तो उन्होंने कभी छोड़ा न उनसे मुह मोड़ा न उनके लिए कोई समस्या खड़ी की। उनका आदर्शवाद सिर्फ दूसरों के लिए नहीं था वल्कि स्वयं उस पर अक्षरसः अमल करते थे। सही दिनचर्या, सम्यक भोजन और संयम का वे हर अर्थों में पालन करते थे।वे स्वभाव के दृढ़निश्चयी, और अक्खड़  थे, लेकिन ऐसा उनका व्यक्तिगत स्वभाव था।
  • एक बार बाबा पैसेंजर रेल से कहीं जा रहे थे। उन्होंने सामने बैठे यात्री को खैनी चुनाते देखा तो उस समय खैनी के शौकीन होने के नाते थोड़ी खैनी देने की मांग कर बैठे। सामने बैठे यात्री ने खैनी देने से मना कर दिया। सामाजिक भाईचारे के इस क्षरण को वे सहन नहीं कर पाए उन्होंने तब से हमेशा के लिए खैनी खाना बंद कर दिया। सच्ची घटना।
  • ऐसे ही एक बार बाबा ने किसी को महावीर पान दुकान पर भेजा पान लाने के लिए और संदेश भिजवाया कि पैसा आकर देता हूँ। महावीर पानवाले ने बिना नकद के पान देने से मना कर दिया। अपनी जर्दे की आदत से छुटकारा पाने का कारण खोज रहे बाबा इस घटना से काफी क्षुब्ध हुए। उन्होंने पानवाले को कुछ नहीं कहा और उस दिन से पान खाना बंद कर दिया।

Hemant Das, ‘Him’ [Grand son] , Author, Literature critic and Blogger (https://bejodindia.blogspot.com/)

 

अभियांत्रिक अभियानों के चैंपियन

  • बार बार घड़ी की बदलने वाली बैटरी पर पैसा लगने से तंग आकर उन्होंने स्वयं एक “जल- घड़ी” का डिज़ाइन बना डाला जो पानी से चलता था और इसमें कोई मशीन भी नहीं था । पानी के एक एक बूँद गिरने से सेकंड की सूई चलती थी। डायल के लिए पुराने चकला (रोटी बनाने बाला) और सूई के लिए लकड़ी के टुकड़े का व्यवहार किया था । अस्सी के दशक में कई महीनों तक उनको इस आईडिया के एक्सेक्यूटिव से जूझते देखा । आधी बनु जल घडी सालों तक हमारे छत पर रही , उनकी क्रियात्मकता का स्मरण कराती ।
  • तीन मंजिले घर की छत पर स्वयं तो चले जाते थे पर दादी की असमर्थता को देख उन्होंने स्वयं मानव चालित लिफ्ट बनाने का प्रयास किया । डिज़ाइन काफी मौलिक -सा था लेकिन काफी हद तक साध्य भी, काम से काम, हल्की फुल्की वजन के लिए । बेटों (स्व लक्ष्मण दास [१९३४ -१९९३] और श्री रमाकांत दास ) ने फंडिंग के बारे में काफी सपोर्ट भी दिया । लेकिन ऐसा याद नहीं आता की उस लिफ्ट का प्रोटोटाइप पर वे कोई पहल कर पाए ।

Binita Mallik [Grand daughter], Author, Artist and Homemaker (www.mithilangan.org)


श्री खड्ग बल्लभ दास ‘स्वजन’ के परिवार से कुछ नोट्स

श्रीमती आशा लता (पत्नी : स्व लक्ष्मण दास [1934-1993], पुत्र: श्री खड्ग बल्लभ दास ) | संशोधित संस्करण: २३ अक्टूबर २०१९  | ashalata194@google.com)

नोट १:  मैथिली विदुषी डॉ. वीणा कर्ण के द्वारा की गई ‘स्वजन’ कृत मैथिली महाकाव्य सीता-शील’ की शोधपरक समीक्षा आकाशवाणी,पटना से पटना से जनवरी 2017 में प्रसारित हो चुकी है और उंनका आलेख प्रकाशनाधीन है. विदुषी डॉ. वीणा कर्ण को दास परिवार की तरफ से हार्दिक धन्यवाद.

VK

नोट २ : ‘अत्रि-अनूसूया सँ भेंट’ (पृ. 64, मूल संस्करण) में कवि द्वारा कही गई एक बात पर स्पष्टीकरण आवश्यक है जिसमें संस्कारहीन आचरण वाली महिलाओं को वैधव्य का अभिशाप दिया गया है. ‘सीता-शील’ के रचयिता के परिवारवालों का स्पष्टीकरण यह है कि संस्कारहीन महिलाओं को वैधव्य का दण्ड देने की इच्छा का अर्थ यह कधापि नहीं है कि सभी विधवाओं के आचरण में संस्कार की कमी होती है. वास्तव में कवि ‘स्वजन’ विधवाओं का बहुत आदर करते थे और उनकी करुण दशा को देख कर बहुत द्रवित थे. अत: उन्होंने संस्कारहीन महिलाओं को वैधव्य का दंड देने की माँग की. कवि ‘स्वजन’ ने बचपन में ही पिता को खो दिया था और माँ को भी. सच तो यह है कि उन्होंने अपने जीवन में मात्र एक ही फिल्मी गाने को पसंद किया जो माँ के प्रेम के विषय पर था.


Book Review (in Hindi) By Shri Bhagwat Sharan Jha “Animesh”, a renowned Hindi poet from Patna

कवि स्वजन और उनकी सीता-शील

पुस्तक-समीक्षा- भागवत शरण झा ‘अनिमेष’

ई-मेल: bhagwatsharanjha@gmail.com

मोबाईल: 8986911256

‘’सीता-शील’ वर्ष 1986 ई. में श्रीविद्यार्जुन प्रकाशन, पटना द्वारा प्रकाशित एवं श्री खड्गवल्लभ दास ‘स्वजन’ द्वारा विरचित काव्य-पुस्तक है. यथा नाम तथा गुण की धारणा को चरितार्थ करते हुए यह संग्रह परम पठनीय है. सीता की जन्म्भूमि मिथिला की लोक्भाषा मैंथिली में इसकी रचना होने के कारण यह और भी अचिक पठनीय है. ‘सीता-शील’ पुस्तक का नाम शत-प्रतिशत सार्थक है. श्री सीता जी के व्यवहार, विचार और संस्कार पर फोकस करते हुए कवि’ स्वजन’ जी ने एक अद्भुत काव्य-संसार की सृष्टि की है जहाँ सारा वर्णन लोक, परम्परा और भक्ति की अविरल धारा से स्वच्छ, भावप्रवण और निर्मल है. हिन्दी साहित्य सहित अन्य साहित्यों में भी महाकाव्य की परम्परा रही है जिसमें नायक का चरित्र-चित्रण प्रधान होता है. मैथिली में भी सीता के चरित्र पर कई काव्य रचे गए हैं जो कि स्वाभाविक भी है. प्रस्तुत पुस्तक एक ही छंद में सीता के सम्पूर्ण आलोक को उद्भासित करता है. कार्यशास्त्र विनोदेन कालोगच्छ्ति धीमताम …. के सूत्रवाक्य को आत्मसात कर कवि ने ‘सीता-शील की रचना की है.

“मात्रा अठाइस पाँति प्रति लघु-गुरु चरण केँ अन्त में

सुन्दर श्रवण-सुखकर मधुर हरिगीतिका केँ छ्न्द में

कैलहुँ कतहुँ प्रयोग नहिं अपशब्द “सीता-शील” में

नहि कैल वर्णन कतहुँ कठिन कुवाक्य या अश्लील में”

अठाइस मात्रा वाली ‘हरिगीतिक’ छ्न्द में कवि ने पूरा ‘सीता-शील’ रच दिया है. यह कवि की दृढ़ ईच्छा-शक्ति, अद्भुत संकल्प-शक्ति और सागर की तरह विस्तृत साधना-भाव को स्पष्ट करता है. उस पर कवि की विनम्रता – उच्च कोटि की विनम्रता उस पीढ़ी का स्मरण कराती है जिसके कारण हरि-भक्ति और देश-भक्ति का अमृत जन-गण-मन को मिला. कवि ने स्वयं स्वीकार किया है कि उन्होंने इस पुस्तक के किसी भी स्थान पर ‘कठिन’, ‘कुवाक्य’ और ‘अश्लील’ शब्दावली का प्रयोग नहीं किया है. सरल, सभ्य और श्लील शब्दों के प्रति सहज आग्रह के कारण ‘सीता-शील’ एक सफल रचना बन सकी है, एक उदात्त काव्य बन सका है, एक निर्मल शब्द-नैवेद्य बन सका है. एक भक्त हृदय सर्वत्र कवि हृदय को नियंत्रित करता चलता है. इस कवि में महाकवि का धैर्य है. इस कवि ने पद्यमय किंतु औपन्यासिक सजगता का परिचय दिया है. एक लम्बी रचना-यात्रा पर कवि चल निकला है, किन्तु वर्णन-क्षमता में कोई बोरियत, भारीपन, बासीपन या ‘वर्णन के लिए वर्णन’ का दुर्गुण नही है.

रचनामें कवित्व स्वय आया है. कवि ने हठयोग नहीं किया है. वल्कि साधना की है. सीता-जन्म के वर्णन से जुड़ी निमांकित पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं:

“मानू प्रकृति अवतरित भेली जानकी के रूप में

तैं पवन सुरभित मंद सुखप्रद ताप सूर्यक धूप में”

“नभ छ्ल अहा! निर्मल अधिक मधुमास-सन छ्ल मधुरिमा

उत्फुल्लता उत्कल जकाँ प्रात: उषा-सन अरुणिमा”

श्री सीताजी के जीवन में कई बार ऐसे प्रसंग आएँ हैं जो कि परम मर्मस्पर्शी हैं. कवि की उन मर्मस्पर्शी प्रसंगों पर पकड़ है. हाँ, वे उसे ज्यादा लम्बा नहीं कर सके हैं. उनकी चिन्ता पुस्तक का तेवर है. पुस्तक सर्वत्र पठनीय हो, मनोरम हो, रमणीय हो, वह भी शालीनता के साथ – यही कवि का संकल्प है. हिन्दी साहित्य के द्धिवेदी-युग के काव्यादर्श से ‘सीता-शील’का काव्यादर्श मेल खाता है. प्रकृति और प्रवृत्ति की दृष्टि से भी यह सुन्दर सरस पुस्तक द्धिवेदीयुगीन रचनाधर्मिता का स्मरण दिलाता है. ‘सीता-शील’ एक वैष्णव-मन की वीणा की झंकार है जिसे पढ़ते हुए हिन्दी के यशस्वी वैष्णव कवि जिन्हे राष्ट्रकवि भी कहा गया है, प्रात:स्मरणीय मैथिलीशरण: गुप्त की याद सहसा आती है, बारंबार आती है.

इसी पुस्तक के परिशिष्ट में पृष्ठ 223 पर ‘शिव-प्रति श्रद्धा-समर्पण’ कवि की रचना-क्षमता का एक नमूना है. व्याकरण की दृष्टि में इसे मात्राहीन शब्द-बन्ध कहा जाता है. पृष्ठ 222 से स्पष्ट है कि कवि ‘ईश्वर-नाम’ में छुपे चमत्कार को भक्ति-भाव से व्यक्त करने का लक्ष्य रखता है न कि काव्य-चमत्कार (शिल्प-वैशिष्ट्य) के आधार पर अपनी यशकामना का लोभ रखता है. बाजारवाद के प्रबल प्रभावयुक्त इस युग में हम कवि से ‘सादा जीवन- उच्च विचार’ की मर्यादित लीक पर चलना सीख सकते हैं. ’सीता-शील’ पुरुष-मन को भी उतना ही आकर्षित और परिष्कृत करता है. वस्तुत: यह ‘जन’ के मन से निकल कर आम पाठकों तक पहुँचती है. ऊनके मन का रंजन और परिष्कार दोनो करती है.

सारत:’सीता-शील’ एक सफल काव्य-पुस्तक है जो कि पाठकों को आमंत्रित करता है, न कि आक्रान्त करता है. यह पुस्तक एक सफल कवि की सफल रचना है जो कि कवियों के लिए ‘पाठकों के अकाल’ के समस्या के हल का एक नमूना भी है. प्रस्तुत पुस्तक के रचयिता ‘स्वजन’ जी सचमुच सुकवि हैं. आज के रचनाकार के प्रेरणास्रोत हैं. [इस पुस्तक को एक अच्छे समीक्षक की आवश्यकता है जो राष्ट्रीय स्तर तक निष्पक्ष काव्य-विमर्श करें न कि कृति का पोस्टमार्टम. एक काव्य-रसिक होने के नाते रचनाकार को कोटिश: नमन.]

पुस्तक-समीक्षा- भागवत शरण झा ‘अनिमेष’ | ई-मेल: bhagwatsharanjha@gmail.com | मोबाईल: 8986911256

Sri Bhagwat Sharan Jha Animesh

One comment

  1. मार्मिक विवेचना प्रशांतजी, आपके व्यक्तिगत वेबसाइट के लिए भी बधाई😊

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