-Prashant Das ‘साहिल’
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नई हैं नज़्में, नई किताबें, वही दानाई तो ज़िन्दगी है
पुराने किस्से, वो ही तमन्ना, वही जुदाई तो ज़िन्दगी है।
उम्र गुज़री, हैं साल बीते, रिज़्क लेता मेरी जान हर पल
वो मिलेंगे कुछ ही पल को, फिर विदाई तो ज़िन्दगी है।
ज़रा हक़ीक़त, ज़रा कहानी, चुन ली बातें बुन ली बातें
पारा-पारा तज़किरा में, ज़री सिलाई तो ज़िन्दगी है।
ढूंढते जिसको हैं हरदम, महफ़िलों में, वादियों में
भीड़ में मिलती है अक्सर, वो तनहाई तो ज़िन्दगी है।
काग़ज़ों पर लिखती जाती, चीखती खामोश रह कर
कभी सुर्ख़, कभी स्याही, रौशनाई तो ज़िन्दगी है।
इन किलों और ज़ंजीरों में, उम्रकैद रहा वो मुजरिम
कौन मजलिस, कौन मुंसिफ़? न दे रिहाई तो ज़िन्दगी है।
वही सफ़र है जावेदानी, मंजिलें भी नई नई हैं
लंबी रातें, दूर ‘साहिल’, बेइंतहाई तो ज़िन्दगी है।
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दानाई = intellect, रिज़्क = occupation, पारा-पारा = shattered, तज़्किरा = narrative, जावेदानी = eternal