आप गर हम हो जाते

  • Prashant Das ‘Sahil’

काश ऐसा होता साहब, आप गर हम हो जाते
ग़लतफ़हमी मिटती जाती, और ग़म कम हो जाते

आपकी ऊंची है इमारत, यहां संकरी सी गली
पुल बनता तो नज़दीक, आप औ’ हम हो जाते

दिल-ए-ग़रीब के दर पर, आपकी दस्तक होती
नरम हो जाता रेगिस्तान, शोर सरगम हो जाते

हमें शिकायत थी मंज़ूर, और शिकवे भी सारे
मुस्कुराते  गर कहते सब, मेरे मरहम हो जाते

आपके नज़र की चिंगारी,  बुझा देते जो साहब
कसम से चुभने वाले तीर सभी शबनम हो जाते

दीवारों की वो तसवीरें, कोई बचा सकता गर
बचाने वाले सब के सब, सबके सनम हो जाते

पुराने क़स्बे जले जहां, कोई कुछ फूल चढ़ाता
टूटे हुए मकां ‘साहिल’, दैर-औ-हरम हो जाते

English translation by ChatGPT

Wish it were possible, sir, for you to become me,
Misunderstandings would fade, and sorrows would flee.

Your towering mansion, my narrow street,
A bridge would form, and we’d finally meet.

If only your knock graced a poor heart’s door,
The desert would soften, melodies from noise would soar.


I accepted your complaints, and every grievance too,
If only you’ said with a smile, they would turn into cure, true.

That fire in your eyes, if extinguished, sir,
The piercing arrows would turn into dew, I’m sure.

If someone could save those painted walls,
The saviors would become beloved of all.

In burnt old towns, if someone laid a flower,
The broken homes, dear “Sahil,” would turn to sacred towers.

वह दास्तानें फिर कभी

  • Prashant Das ‘Sahil’

वह दास्तानें फिर कभी, अपनी जुबानी फिर कभी
ये फलक है रंगीं सी हुई अब आसमानी फिर कभी

ये महफ़िलों की है गली, यहाँ सुब्ह क्या औ’ शाम क्या
ख़्वाबों में जीने वालों की, असली कहानी फिर कभी

जल-जल के दहके जाये जो, सीना मेरा ये कलम मेरा
मर-मर के बीते जाते पल, अब जिंदगानी फिर कभी

दर्दों में जीने का हुनर सीखा किये बरसों से हम
बरपे कहर अब हर पहर, हो मेहरबानी फिर कभी

हैं दाग़-ए-दिल के निशां छिपे, पर्दों में यूँ ही रह गए
हर चीज़ का होता ज़िकर, उनकी निशानी फिर कभी

पलकों छलकता जाम यूँ, आँखों से बहती है नदी
हर पल अंधेरा ही रहे, सुबह सुहानी फिर कभी

बातें पुरानी फिर कभी, और ये जवानी फिर कभी
‘साहिल’ मिले तो यूँ करें, हर पल रूमानी फिर कभी

नई हैं नज़्में, नई किताबें

-Prashant Das ‘साहिल’

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नई हैं नज़्में, नई किताबें, वही दानाई तो ज़िन्दगी है
पुराने किस्से, वो ही तमन्ना, वही जुदाई तो ज़िन्दगी है।

उम्र गुज़री, हैं साल बीते, रिज़्क लेता मेरी जान हर पल
वो मिलेंगे कुछ ही पल को, फिर विदाई तो ज़िन्दगी है।

ज़रा हक़ीक़त, ज़रा कहानी, चुन ली बातें बुन ली बातें
पारा-पारा तज़किरा में, ज़री सिलाई तो ज़िन्दगी है।

ढूंढते जिसको हैं हरदम, महफ़िलों में, वादियों में
भीड़ में मिलती है अक्सर, वो तनहाई तो ज़िन्दगी है।

काग़ज़ों पर लिखती जाती, चीखती खामोश रह कर
कभी सुर्ख़, कभी स्याही, रौशनाई तो ज़िन्दगी है।

इन किलों और ज़ंजीरों में, उम्रकैद रहा वो मुजरिम
कौन मजलिस, कौन मुंसिफ़? न दे रिहाई तो ज़िन्दगी है।

वही सफ़र है जावेदानी, मंजिलें भी नई नई हैं
लंबी रातें, दूर ‘साहिल’, बेइंतहाई तो ज़िन्दगी है।


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दानाई = intellect, रिज़्क = occupation, पारा-पारा = shattered, तज़्किरा = narrative, जावेदानी = eternal

रह जाए ग़र तो इश्क है

-Prashant Das ‘साहिल’

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रह जाए ग़र तो इश्क है, खो जाए ग़र तो मर्ज़ है
ये दर्द-ए-दिल की है सदा, तू गुनगुना क्या हर्ज़ है।

दिल रात भर जलता रहा, हम रात भर लिखते रहे
इन ग़ज़लों में अब है ही क्या, न साज़ है न तर्ज़ है।

हमदर्द जानें हैं कहां, कोई चारागर मिलता नहीं
अब पारा-पारा दिल हुआ, इलाज की किसको ग़र्ज़ है।

हम दौलतों के ख़्वाब में, उस दर गए इस दर गए
जेबों में भर के आए हैं, कुछ अश्क है कुछ क़र्ज़ है।

दिल काग़ज़ का है किला, इन चिंगारियों के वक्त में
उठ रहे शोलों को बुझा, ये ही मुनासिब फ़र्ज़ है।

वो पंचनामा कर गए, मेरा नाम जिसमें दर्ज़ है
उन शरीफ़ों को दुआ है  ‘साहिल’ आदाब अर्ज़ है।

फिर धुंध उठी

-Prashant Das ‘साहिल’

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फिर धुंध उठी, मौसम-ए-बहार आया
क्या हुआ, अब कौन सा बुख़ार आया।

दवा तक देते नहीं अब चारागर
मरज़ आया नहीं, दर्द ज़ार-ज़ार आया।

पिछली बार मैख़ाने गए कब याद नहीं
बिन पिये कौन सा ख़ुमार आया।

दफ़्तर पड़ी उस मेज़ पर लेटा अक्सर
और याद मेरे गांव का, हिसार आया।

मालूम था कि वस्ल उनका नामुमकिन
अक्सर गया, करके इंतज़ार आया।

दश्त के फूलों से हमको क्या लेना
तपती हुई धूलों का कर ग़ुबार आया।

कर गुहार आया, ज़ीस्त दे उधार आया
तर्क-ए-आरज़ू ‘साहिल’ बेशुमार आया।